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Monday, May 22, 2023

मेरी ट्रेन यात्रा , न्युजलपाई गुडी से रायपुर यात्रा का अनुभव

 मेरी ट्रेन यात्रा 

न्युजलपाई गुडी से रायपुर यात्रा का अनुभव 





                       ट्रेन में यात्रा का एक अलग आनंद होता है। वह भी एक शादी समारोह में जाते ग्रुप के साथ यदि  यात्रा का मौका मिले तो इससे अच्छा अनुभव शायद न हो।  काफी दिनों बाद ट्रेन में यात्रा का मौका मिला , वह भी लगभग चोदह सो किमी लम्बी रेल यात्रा का , एक अलग सा उत्साह था इस यात्रा को लेकर ,  न्युजलपाई गुडी स्टेशन से हमारी यात्रा शुरू हुई हमारा गंतव्य  छतिसगढ़ की राजधानी रायपुर था।  उस दौरान रायपुर स्टेशन में हो रहे विकास कार्यो को लेकर हमारा स्टोपेज रायपुर से पहले उरकुरा स्टेशन पर होना था।  खेर लगभग आधे घंटे की लेट से हमारी ट्रेन न्युजलपाईगुडी स्टेशन पहुची , इससे पहले  अहले सुबह की ट्रेन पकड़ने के लिए हम मध्य रात्री ही स्टेशन पर पहुँच चुके थे।  कभी साफ़ सफाई के लिए उदहारण पेश करने वाले भारतीय रेलवे के स्टेशनों पर अब वह बात नहीं रही,  चारो तरफ गंदगी और इस कारण स्टेशन पर मच्छरो का डेरा।  करीब दो घंटे का समय मच्छरों से निपटने में बीता।  

                         वही जब ट्रेन के नियत समय से आधा घंटा बाद ट्रेन के आने की घोषणा हुई तो पुरे ग्रुप ने राहत की साँस ली।  अपने सामानों को कुलियों और साथी यात्रियों के साथ लेकर  हम ट्रेन का इन्तजार करने लगे।  ट्रेन न्युजलपाई गुडी स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर तीन पर जेसे ही आई हम अपने डब्बे में सामान चढ़ाने लग गए।  शादी का ग्रुप था लगभग तीस आदमी इस ग्रुप में थे बड़े बूढ़े , बच्चे और जवान सभी और सीट दो डब्बे में , वेसे भी हम मारवाड़ी  जब हम यात्रा करते हे तो सामान कुछ ज्यादा ही हो जाता है और यह तो शादी में जाने का मौका , स्वाभाविक है सामान कुछ ज्यादा ही  थे , ये सामान सेट करते करते ट्रेन स्टेशन को छोड़ कर अगले स्टेशन के लिए रवाना हो चुकी थी।  अगला स्टेशन था मालदा , इस दौरान सुबह हो चुकी थी हमारे ग्रुप में शामिल सभी लोगो को नींद आने लगी थी हमने भी एक सीट पकड़ी और थोडा नींद लेने की सोची , इस दौरान काफी देर तक  मालदा स्टेशन के आउटर पर गाडी रुकने के कारण ट्रेन में वेंडर की आवाजाही शुरू हो गई और हमारी नींद टूट गई , काफी देर तक मालदा स्टेशन के  आउटर पर ट्रेन रुकी रही।  ट्रेन के खड़े खड़े अचानक यह ख्याल आया की क्या भारतीय रेलवे की ट्रेनों का  आउटर पर रुकना कभी बंद होगा  या हमेशा यह झंझट यात्रियों को भुगतना होगा।  इसी दौरान बाथरूम की तरफ मेरे पाँव बढे लेकिन वहा खड़े यात्रियों ने सुचना दी की बाथरूम में पानी ही नहीं है।   यह तो मालदा स्टेशन आने के पहले ही मालुम पड़ जाने के कारण मेने इस बात की सुचना ट्विटर के जरिये सम्बन्धित अधिकारियों को दिया और मालदा में काम चलाऊ पानी डब्बो में चढ़ाया गया।  यह तो अच्छा हुआ की मालदा में डब्बे में पानी चढ़ाया गया क्योकि यहाँ के बाद इस ट्रेन में यह व्यवस्था सीधे खड़गपुर में मिलनी थी जो शाम को आता।  खेर मालदा स्टेशन पर गरम गरम चाय और शादीघर से लिए नास्ते के साथ दिन की अच्छी शुरुआत हुई ,   यहाँ से ट्रेन ने  अपनी रफ़्तार पकड़ी तो हमारी खातिरदारी भी शुरू हुई , भले हम लड़की के शादी में जा रहे थे लेकिन लड़की के पिता की शादी में जा रहे लोगो की खातिरदारी काबिलेतारीफ थी , नास्ता के बाद शुरू हुई खातिरदारी लगातार जारी थी , 








 वही बीच बीच में डब्बे में स्थानीय भेंडर का आना लगा हुआ था , झाल मुड़ी से लेकर तोलिया तक और जूता पालिस से लेकर पान मसाला तक भारतीय रेलवे में सब कुछ मिल सकता है , वही दुसरे डब्बे में गेट के टूटने का मामला भी इसी दौरान सामने आया ,




 हमने इसकी शिकायत तो ट्विटर पर की ही इन दिनों टेब के साथ घुमने वाले टीटी महोदय को भी कर दी , टेब के साथ टीटी महोदय को देखकर यह आभास हुआ की बदल तो रहा है भारतीय रेलवे , 

 इसी बीच डानकुनी स्टेशन पर हमारे दिल के टुकड़े मेरी दो बेटिया ट्रेन में चढ़ी , इन दोनों के इन्तजार में हमने खाना भी नहीं खाया था वेसे भी आज मेरी बेटी का जन्मदिन था , एक अलग ही उत्साह के साथ ट्रेन में हमने मझली बेटी का जन्मदिन मनाया , एक नये और यादगार रूप में ,



 इसके बाद खाने पीने का दौर चलता रहा , दो डब्बे में फैले साथी यात्रियों से मिलने जुलने के लिएसी डब्बे से उस डब्बे आना जाना भी लगा रहा . और फिर आया खड़कपुर जहां से रात का ताजा और गरम गरम खाना हमें मिला , सभी सहयात्रियों के साथ ट्रेन चलने के बाद हमने खाने का स्वाद लिया , और खेलते खेलते कब नींद के आगोश में आ गए की मालुम ही नहीं पड़ा , सुबह उस वक्त नींद टूटी जब सहयात्रियों ने डब्बे में साफ़ सफाई को लेकर हल्ला मचाना शुरू किया तो देखा की बाथरूम की सफाई नहीं होने से गंदा पानी डब्बे में आ रहा है , हमारी अटेचिया खराब न हो जाये इस कारन गन्दा पानी हमारे कूपे तक आये इसके पहले ही हमने सारे सामानों को बगल में मोजूद पेंटी कार में शिफ्ट किया और राहत की सास ली , इस दौरान प्रत्येक डब्बे में मोजूद सफाई कार्मियो को भी नींद से उठाकर हमने ,मामले की जानकारी और उन्होंने इस दौरान इसकी सफाई करवाई  , सच में प्रत्येक डब्बे में अलग  अलग सफाई कर्मी की मोजुदगी के कारण डब्बो की सफाई तुरंत होने लगी है , इसी दौरान हमारी ट्रेन हमारे गंतव्य स्टेशन उरकुरा पहुँचने वाली थी, ट्रेन अब तक चार घंटे लेट हो चुकी थी , इस स्टेशन पर उतरने का भी अलग ही अनुभव रहा , स्टेशन इतना छोटा की एक बार में आधी ट्रेन ही स्टेशन पर आती है , यानी इस ग्रुप को दो बार में स्टेशन पर उतरना पड़ा , पहले हम आगे वाले डिब्बे में मोजूद लोगो के साथ उतरे , उसके बाद ट्रेन का एक हिस्सा आगे बढ़ गया तब पिछले हिस्से में मोजूद साथी यात्री उतरे , आखिर कार किसी तरह हम रायपुर पहुच ही गए 
अब जल्दी ही वापसी यात्रा का अनुभव साझा करूँगा ,   

Saturday, September 10, 2022

ट्रेनों के लेट होने पर रेलवे का नया फंडा, ट्रेनों के सफ़र की अवधी को बढ़ाया, गंतव्य पर भारी लूज टाइमिंग से चल रही है ट्रेन

ट्रेनों के लेट होने पर रेलवे का नया फंडा
ट्रेनों के सफ़र की अवधी को बढ़ाया
 गंतव्य  पर  भारी लूज टाइमिंग से चल रही है ट्रेन 

ट्रेनों की लेटलतीफी से यात्रियों में बढ़ रही नाराजगी को दूर करने के लिए कटिहार  रेल मंडल  ने नया रास्ता निकाल लिया है। रेलवे द्वारा  अलुआबाड़ी सिलीगुड़ी रेलखंड में चलने वाली  ट्रेनों के सफर की अवधि को ही बढ़ा दिया है । इससे ट्रेन अब अपने गंतव्य स्टेशन पर देरी से पहुंचेगी, लेकिन तकनीकी रूप से ट्रेनों को लेट नहीं कहा जाएगा।  ट्रेनों के गंतव्य पर  भारी लूज टाइमिंग से चलेगी   किये जाने के कारण रेलवे भले यह दिखाने में कारगर सिद्ध हो रही है की ट्रेने समय से चल रही है लेकिन कभी कभार यात्रियों को इस    लूज टाइमिंग  के कारण घंटो बैठना पड़ रह है 

कंचनकन्या एक्सप्रेस में बागडोगरा  से सिलीगुड़ी की 10 किमी की दुरी 45 मिनट में :  ट्रेने के गंतव्य पर  लूज टाइमिंग का असर यह है की अलुआबाड़ी - सिलीगुड़ी रेलखंड पर चलने वाली ट्रेने यदि नियमित समय पर बागडोगरा पहुच जाए तो लगभग आधे घंटे तक ट्रेनों को यहाँ रोक दिया जाता हे .  सियालदाह से आने वाली कंचनकन्या एक्सप्रेस ठाकुरगंज से बागडोगरा की 46 किमी की दुरी 50 मिनट में पूरी करती हे लेकिन बागडोगरा से सिलीगुड़ी की 10 किमी की दुरी तय करने के लिए रेलवे ने 45 मिनट निर्धारित किये है .यही लूज टाइमिंग रेलवे ट्रेनों की लेटलतीफी के दौरान मेनेज करता हे 

राधिकापुर ड़ेम्यु के यात्रियो को नक्सलबाड़ी में होना पड़ता है परेशान : राधिकापुर से सिलीगुड़ी के बीच चलने वाली ड़ेम्यु का समय  ठाकुरगंज में सुबह 9 : ५८ है , इस  ट्रेन का समय  नक्सलबाड़ी में 10 : 43 पर निर्धारित है वही यह ट्रेन बागडोगरा 12 : 08 पर तो सिलीगुड़ी दोपहर 12 : 30 पर पहुँचने का निर्धारित है .  यानी ठाकुरगंज से नक्सलबाड़ी के 33 किमी की दुरी 45 मिनट में यह ट्रेन तय  करती है लेकिन नक्सल बाड़ी से बागडोगरा तक की 13 किमी की दुरी तय करने में इस ट्रेन को एक घंटा 15 मिनट लगता है , लेकिन बागडोगरा से सिलीगुड़ी के 10 किमी की दुरी केवल 22 मिनट में ही ट्रेन तय कर लेती हे . अब यह तो रेलवे ही बताएगा की इस ट्रेन के परिचालन के समय नक्सलबाड़ी से बागडोगरा के बीच क्या आपदा आती है की 13 किमी की दुरी पूरी करने में एक घंटा 15 मिनट लग जाता हे 

कैपिटल को बागडोगरा से सिलीगुड़ी पहुँचने में लगते हे  10 मिनट    : रेलवे टाइम टेबल पर यदि नजर डाली जाए तो इस रेल खंड पर चलने यात्रियों की पीड़ा समझी जा सकती है . कंचनकन्या को बागडोगरा से सिलीगुड़ी 10 किमी पहुँचने में 45 मिनट तो कटिहार इंटर सिटी को यह दुरी तय करने में 50 मिनट वही मालदा ड़ेम्यु को यह दुरी तय करने में एक घंटा 20 मिनट वही बालुरघाट इंटरसिटी को यह दुरी तय करने में 35 मिनट लगते हे वही महानंदा एक्स्प्रेस को 25 मिनट तो कैपिटल को केवल 10 मिनट लगती है 

लूज टाइमिंग यात्रियों की परेशानी का बन रहा कारण :   आम तोर पर राधिकापुर डेम्यु नियत समय पर ही चलती है लेकिन नियत समय पर यह ट्रेन नक्सलबाड़ी पहुँचती है तो उसको वहां कम से कम एक घंटा बैठा दिया जाता हे . उसके बाद ही ट्रेन को सिलीगुड़ी की तरफ रवाना किया जाता हे . 

 एक ही स्टेशन की दुरी तय करने में अलग मापदंड क्यों :  बागडोगरा से सिलीगुड़ी की दुरी 10 किमी है तो इस 10 किमी की दुरी करने में अलग अलग ट्रेनों को अलग अलग समय केसे लग सकता है .   ट्रेनों की लेटलतीफी को कंट्रोल करने के चक्कर में यात्रियों को परेशान कर रहा है रेलवे 


Sunday, September 6, 2020

किसनगंज के किसानों को नई राह दिखा रहे है ड्रेगन फ्रूट उत्पादक नागराज नखत

 : 75 वर्ष की उम्र में किसी को भी रिटायरमेंट नजर आने लगेगा लेकिन ठाकुरगंज  में उम्र के इस पढ़ाव को पार कर चुके एक  किसान खेतों में जुटे हैं। खेती में ही दिन बिताने से इन्हें सुकून मिलता है। इस उम्र में खेती करने के  बाबजूद इनका  जज्बा और फुर्ती  देखते ही बनती है .लेकिन खेती के शौक़ीन युवाओं के लिए भी  ये बूढ़े किसान  एक संदेश दे रहे हैं।  हम बात कर रहे है ठाकुरगंज के नागराज नखत की , ठाकुरगंज में ड्रेगन फ्रूट की खेती को सम्पूर्ण सूबे को नई राह दिखाने वाले 75 वर्षीय नागराज नखत आज परिचय के मोहताज नहीं है .   नागराज नखत ने ही इलाके में केले की खेती शुरू की थी बात १९६८ की है जब  पढ्न पाठन कर कोलकत्ता से ठाकुरगंज आये श्री नखत ने परम्परागत कार्य व्यवसाय छोड़ कर खेती करने की ठानी . इस बात पर उनके परिजनों ने भी काफी सहयोग किया ओर  भुसावल से केला की पुली लाकर इलाके में पहली बार सिंगापुरी केले की खेती शुरू की . इस दौरान इलाके में पहली बार लाल केला की खेती भी इन्होने ही कर के अब तक जुट , धान और गेहू की फसल की खेती करने को मजबूर इलाके के किसानो को नगदी फसल की तरफ आकर्षित कर दिया . श्री नखत का यह  प्रयास उनलोगों के लिए भी एक नई राह दिखा सकता है जिन्होंने कोरोना संकट में अपनी नौकरी गवाई है .बताते चले कोरोना संकट में नौकरी का सपना देखने वालों को बड़ा धक्का लगा है. कोरोना के चलते कंपनियों में हायरिंग थम सी गई है. ऐसे में लोग नौकरी करने के बजाए खेती-किसानी में हाथ आजमाना के बारे में सोच सकते हैं. अगर आपके पास जमीन है तो आप खेती के जरिए बेहतर कमाई कर सकते हैं और अपना जीवनयापन कर सकते हैं.  ड्रेगन फ्रूट  कम लागत में शुरू होकर  अच्छी कमाई दे सकता है


 क्या है ड्रेगन फ्रूट :    ड्रैगन फ्रूट कैक्टस प्रजाति का है. इसमें पानी की खपत बहुत कम होती है और इसके पौधे में कीड़े नहीं लगते. विदेश में ड्रैगन फ्रूट की मांग अधिक है जिस कारण इस फल की कीमत भी अधिक है. ड्रैगन फ्रूट सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है. इसमें काफी मात्र   में  एंटीऑक्सी डेंट के गुण मौजूद होते हैं. इसके अलावा विटामिन सी, प्रोटीन और कैल्शियम भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. इसका फल कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल, कोशिकाओं और ह्रदय की सुरक्षा के साथ फाइबर से भरपूर होता है. इस फल का प्रयोग कई बीमारियों में लाभदायक माना गया है.  

इम्युनिटी पावर बढ़ाता है, शुगर-अस्थमा में फायदेमंद : कृषि वैज्ञानिक हेमंत सिंह  ने कहा कि ड्रैगन फ्रूट  में विटामिन सी होता है जिसके चलते इसमें इम्युनिटी पावर बढ़ाने की क्षमता होती है । इसमें कोलेस्ट्रॉल को कम करने की क्षमता भी होती है। इस समय इसे खाने से लोगों को बहुत फायदा होगा । सिंह ने बताया कि यह फल डायबिटीज व अस्थमा जैसी बीमारियों में भी लाभप्रद होता है। एक ड्रैगन फ्रूट में 60 कैलोरी होती है। किसान इस फसल की खेती कर बड़े पैमाने पर इसका फायदा उठा सकते हैं । 

  क्या कहते है किसान : पिछले छह वर्षो से ठाकुरगंज में ड्रेगन फ्रूट की खेती कर रहे किसान नागराज नखत कहते है की  वर्तमान में इलाके में बिकने वाले फलो में ड्रेगन फ्रूट एक मात्र ऐसा फल है जो कई विमारियो के लिए रामबाण उपाय शाबित हो सकता है . उन्होंने बताया की ड्रेगन फ्रूट शुगर और डायबिटीज के लिए कारगर है ही यह फल  दिल के मरीजों के लिए संजीवनी है  वही महिलाओं के   ब्रेस्ट कैंसर में भी कारगर है और इस फल के सेवन से कोलेस्ट्रॉल भी कंट्रोल में रहता है ही पेट की समस्या और वजन घटाने में भी  कारगर है जानकार बताते है की  अर्थराइटिस से निजात दिलाने और   इम्यूनिटी बढ़ाने में कारगर है यह फल वही  डेंगू जैसी गंभीर बीमारी में भी फायदेमंद है ही  त्वचा, मुहांसों और सनबर्न से भी बचाता है यह फल  कोविड-19 संक्रमण से बचने के लिए जरूरी है, अपनी इम्यूनिटी को मजबूत बनाए रखना। ड्रैगन फ्रूट इम्यून सिस्टम को भी बूस्ट  करता है।

Wednesday, August 8, 2012

जैन धर्मवालाबी क्यों अल्पसंख्यक आरक्षण से वंचित


 

अल्पसंख्यकों को  ओबीसी  कोटा के अंतर्गत 4.5 प्रतिशत आरक्षण देने की केंद्र सरकार की मंशा है। हालांकि आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ किया है कि 'धर्म के आधार पर` आरक्षण का लाभ संविधान के विरूद्ध है। वर्तमान में दिसम्बर 2011 के बाद से शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। पिछले दिनों 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के ठीक पहले केंद्र सरकार ने कुटिल चतुराई से ओबीसी के कोटे में ही खासतौर से मुस्लिमों को लुभाने के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का प्रावधान कर दिया था। इसे उच्च न्यायालय ने अस्वीकारते हुए साफ किया कि कोटा के अंतर्गत उप कोटा दिए जाने का प्रावधान अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए दिया गया है। इसे कानूनी रूप देते हुए कहा गया है कि 'अल्पसंख्यकों से संबंधित` और 'अल्पसंखयकों के लिए` जैसे वाक्यों को जो प्रयोग किया गया है वह असंगत है, जिसकी कोई जरूरत नहीं है। इस फैसले का व्यापक असर होना तय है क्योंकि यह प्रावधान आईआईटी जैसे केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में भी लागू हो गया था।  
वंचित समुदाय वह चाहे अल्पसंख्यक हों अथवा गरीब सवर्ण उनको बेहतरी के उचित अवसर देना लाजिमी है, क्योंकि किसी भी बदहाली की सूरत, अल्पसंख्यक अथवा जातिवादी चश्मे से नहीं सुधारी जा सकती ? खाद्य की उपलब्धता से लेेकर शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जितने भी ठोस मानवीय सरोकार हैं उनको हासिल करना मौजूदा दौर में केवल पूंजी और शिक्षा से ही संभव है। ऐसे में आरक्षण के सरोकारों के जो वास्तविक हकदार हैं, वे अपरिहार्य योग्यता के दायरे में न आ पाने के कारण उपेक्षित ही रहेंगे। अलबत्ता आरक्षण का सारा लाभ वे बटोर ले जाएंगे जो आर्थिक रूप से पहले से ही सक्षम हैं और जिनके बच्चे पब्लिक स्कूलों से पढ़े हैं। इसलिए इस संदर्भ में मुसलमानों और भाषायी अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की वकालात करने वाली रंगनाथ मिश्र आयोग की रिर्पाट के भी कोई बुनियादी मायने नहीं रह गए ?
यह सही है कि हमारे देश में आज भी धर्म और जाति आधारित भेदभाव बदस्तूर हैं। जबकि संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर राष्ट्र किसी भी नागरिक के साथ पक्षपात नहीं कर सकता। इस दृष्टि से संविधान में विरोधाभास भी है। संविधान के तीसरे अनुच्छेद, अनुसूचित जाति आदेश 1950 जिसे प्रेसिडेन्शियल ऑर्डर के नाम से भी जाना जाता है, के अनुसार केवल हिंदू धर्म का पालन करने वालों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में अन्य धर्म समुदायों के दलित और हिंदू दलितों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा है, जो समता और सामाजिक न्याय में भेद करती है। इसी तारतम्य में पिछले पचास सालों से दलित ईसाई और दलित मुसलमान संघर्षरत रहते हुए हिंदू अनुसूचित जातियों को दिए जाने वाले अधिकारों की मांग करते चले आ रहे हैं। रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट इसी भेद को दूर करने की पैरवी करती है।
वर्तमान समय में मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई और बौद्ध ही अल्पसंख्यक दायरे में आते हैं। जबकि जैन, बहाई और कुछ दूसरे धर्म-समुदाय भी अल्पसंख्यक दर्जा हासिल करना चाहते हैं। लेकिन जैन समुदाय केन्द्र द्वारा अधिसूचित सूची में नहीं है। इसमें भाषाई अल्पसंख्यकों को अधिसूचित किया गया है, धार्मिक अल्पसंख्यकों को नहीं। सुप्र्रिम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक माना गया है। परंतु इन्हें अधिसूचित करने का अधिकार राज्यों को है, केन्द्र को नहीं। इन्हीं वजहों से आतंकवाद के चलते अपनी ही पुश्तैनी जमीन से बेदखल कश्मीरी पंडित अल्पसंख्यक के दायरे में नहीं आ पा रहे हैं। हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर सलमान खुर्शीद भी मानते है कि कश्मीरी पंडित अल्पसंख्यक हैं। मध्यप्रदेश में वगववदाजय सिंह की कांग्रेस सरकार के दौरान जैन धर्मावलंबियों को भी अल्पसंख्यक दर्जा दिया था, लेकिन अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सुविधाओं से ये आज भी वंचित हैं। इस नाते' अल्पसंख्यक श्रेणी` का अधिकार पा लेने के क्या राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक निहितार्थ हैं, इन्हें समझना मुश्किल है। यहां तक कि आर्थिक रूप से कमजोर जैन धर्मावलंबियों के बच्चों को छात्रवृत्ति भी नहीं दी जाती।
अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का आधार जिस मिश्र आयोग को बनाया गया है उसका गठन 'जांच आयोग के तहत` नहीं हुआ है। दरअसल इस रपट का मकसद केवल इतना था कि धार्मिक व भाषाई अल्पसंंख्यकों के बीच आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर व पिछडे तबकों की पहचान कर अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण सहित अन्य जरूरी कल्याणकारी उपाय सुझाये जाएं। जिससे उनका सामाजिक स्तर सम्मानजनक स्थिति हासिल कर ले। इस नजरिये से सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों का औसत अनुपात बेहद कम है। गोया संविधान में सामाजिक और शैक्षिक शब्दों के साथ 'पिछड़ा` शब्द की शर्त का उल्लेख किये बिना इन्हें पिछड़ा माना जाकर अल्पसंख्यक समुदायों को 15 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसमें से 10 फीसदी केवल मुसलमानों को और पांच फीसदी गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को दिए जाने का प्रावधान तय हो। शैक्षिक संस्थाओं के लिए भी आरक्षण की यही व्यवस्था प्रस्तावित है। यदि इन प्रावधानों के क्रियान्वयन में कोई परेशानी आती है तो पिछड़े वर्ग को आरक्षण की जो 27 प्रतिशत की सुविधा हासिल है, उसमें कटौती कर 8.4 प्रतिशत की दावेदारी अल्पसंख्यकों की तय हो। वेैसे भी केरल में 12 प्रतिशत, तमिलनाडू 3.5, कर्नाटक 4, बिहार 3, पश्चिम बंगाल 10 और आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा 4 फीसदी मुस्लिमों को आरक्षण पिछड़ा वर्ग के आधार पर ही दिया गया है। केरल में तो आजादी के पहले से यह व्यवस्था लागू है। लिहाजा इस प्रावधान के तहत छह प्रतिशत मुसलमान और 2.4 प्रतिशत अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण की सुविधा दी जा सकती है।

Thursday, July 26, 2012

लो बोले दिग्विजय की असम की हिंसा में सरकार का दोष नही ।


असम में हिंसा और नफरत की आग बुझ नहीं रही है। वही  कांग्रेस के महासचिव और असम मामलों के पार्टी प्रभारी दिग्विजय सिंह ने आग में घी डालते हुए यह कह दिया  कि असम की घटना की गुजरात के दंगों से तुलना नहीं की जा सकती है।  आसाम सरकार को क्लीन चिट देते हुए बडबोले   दिग्विजय ने कह दिया कि गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगे राज्‍य सरकार द्वारा प्रायोजित थे जबकि असम में हिंसा पर काबू पाने के लिए सीएम तरुण गोगोई और उनका पूरा अमला तत्‍काल जुट गया।   
  बांग्लादेश से आ रहे अवैध प्रवासी असम में जारी हिंसा की मूल वजह बताए जा रहे हैं। असम के मूल निवासियों का कहना है कि बांग्लादेश से लगातार भारत में अवैध रूप से घुस रहे लोगों की वजह से वे असुरक्षित महसूस करते हैं। असम के मूल निवासियों का कहना है कि प्रवासियों के चलते इस क्षेत्र का 'संतुलन' बिगड़ गया है। गौरतलब है कि भारत-बांग्लादेश की पूरी सीमा पर तारबंदी न होने और नदियों के चलते सीमा के उस पार से भारत में प्रवेश करना बहुत मुश्किल नहीं है। ऐसे में बड़ी तादाद में बांग्लादेशी लोग बेहतर ज़िंदगी की तलाश में भारत में प्रवेश करते रहे हैं। जानकारों का मानना है कि 1971 के बाद से बांग्लादेशियों का भारत आकर बसना जारी है। असम के नेताओं पर आरोप है कि वे इन अवैध प्रवासियों को पहचान पत्र दे देते हैं, ताकि वे उनके हक में वोट करें। बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर यहां की नागरिकता ले चुके लोगों का कोई औपचारिक आंकड़ा नहीं है। दिल्ली के एक एनजीओ आस्था भारती के हवाले से असम ट्रिब्यून में प्रकाशित खबर में दावा किया गया है कि करीब 2 करोड़ बांग्लादेशी भारत में आकर बसे हुए हैं। इनमें बड़ी तादाद में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं। जम्मू-कश्मीर के बाद असम में मुस्लिमों की सबसे बड़ी आबादी रहती है। प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ी है। 1951 में असम में जहां सिर्फ 24.7 फीसदी मुस्लिम आबादी थी। वहीं, 2011 की जनगणना में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 31 फीसदी हो गया। लेकिन लगता है कि केंद्र सरकार अवैध रूप से असम में रहने वाले प्रवासियों को बड़ी वजह नहीं मानती है। असम में हिंसा में बांग्लादेश का हाथ होने की आशंका को केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया है। असम के कई जिलों, खासकर कोकराझार में फैली हिंसा के लिए बोडोलैंड टेरीटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के गठन में खामियों को भी जानकार जिम्मेदार मान रहे हैं। स्थानीय बोडो समुदाय और प्रवासी अल्पसंख्यकों के बीच संघर्ष बीटीसी के गठन के बाद भी जारी है। गैर बोडो समुदाय के लोगों की शिकायत है कि बोडोलैंड टेरीटोरियल एरियाज डिस्ट्रिक्ट (बीटीएडी) में बोडो समुदाय अल्पसंख्यक है। इनकी आबादी कुल आबादी की एक-तिहाई है। बीटीएडी इलाकों में रह रहे गैर बोडो लोगों की शिकायत है कि बहुसंख्यक होने के बावजूद उन्हें कई अधिकारों से वंचित रखा गयाबोडो समुदाय शिकायत करता रहा है कि अवैध प्रवासी उनके इलाकों में आकर आदिवासियों की जमीन पर बस रहे हैं। बोडो समुदाय के लोगों का कहना है कि बांग्लादेश से सटी सीमा को सील करने की उनकी मांग पूरी नहीं हो रही है। इस समुदाय का कहना है कि बोडो काउंसिल एक्ट गैर बोडो समुदाय के लिए वारदान है क्योंकि यह एक्ट गैर बोडो लोगों के जमीन के हक को वैधता देता है। वहीं, इस एक्ट का वह प्रावधान भी बोडो समुदाय को खटकता है, जिसमें बोडो या गैर बोडो समुदाय के किसी भी नागरिक के जमीन के मालिकाना हक से जुड़े अधिकार को बरकरार रखा गया है। लेकिन असम में हिंसा के पीछे प्रदेश के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को गरीबी वजह के तौर पर दिखाई देती है। गोगोई ने एक निजी चैनल से बातचीत में 'वोट बैंक' की राजनीति को हिंसा की वजह मानने से इनकार किया है। उन्होंने कहा, 'हम अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर करेंगे। ऐसा करके ही इन चीजों को रोका जा सकता है।' असम एक गरीब और पिछड़ा राज्य माना जाता है। योजना आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2010 तक असम के 37.9 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे थे। असम में गरीबी के आंकड़े बढ़े हैं। 2004-05 में 34.4 फीसदी लोग ही वहां गरीबी रेखा से नीचे रहते थे।
पीड़ित जहां नेताओं को अपनी बदहाली के लिए जिम्‍मेदार बता रहे हैं, वहीं मुख्‍यमंत्री राज्‍य की बदहाली को हिंसा का कारण बता रहे हैं। हिंसा के पीछे क्या वजह है? इसे लेकर अलग-अलग दावे और राय सामने आ रही है। हिंसा की चार वजहें सामने आ रही हैं, जिनमें कुछ तात्कालिक हैं तो कुछ वजहें काफी पहले से समस्या बनी हुई हैं।  

Sunday, October 9, 2011

किशनगंज में एएमयू केंद्र के मामले में हो रही है राजनीति

सीमांचल नाम से जाना – जानेवाला बिहार का पूर्वी इलाका इन दिनों सुर्ख़ियों में है | किशनगंज अररिया,पूर्णिया और कटिहार जिलों में यह भू – भाग नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं से सटता है और इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी की बहुलता है |  कभी संघ परिवार के  विद्यार्थी परिषद् द्वारा  चलाए गए घुसपैढ  विरोधी अभियान के कारण सुर्खियों में रहा यह इलाका जिसे लोग चिकेन नेक के रूप में भी जानता है आज अलीगढ मुस्लिम  विश्व विद्यालय  की शाखा खोलने के मामले में चर्चा मे है |  जब विद्यार्थी परिषद्घु ने घुसपैढ  विरोधी अभियान चलाया तो लोगो ने विशेषकर वोटबेंक की राजनीती करने वालो ने इसे मुस्लीम विरोधी अभीयान  के रूप में प्रचारित किया  गया तो कुछ लोगो ने  इन्हें शेरशाह सूरी का वंशज बताया | धीरे - धीरे सच्चाई  सबके सामने आ गई | आज इन बंगला देशीयो से सबसे ज्यादा वे सुरजापूरी मुसलमान प्रताड़ित है जिन्होंने पहले तो इन्हें बसाया | आज क्षेत्र में इन दोनों विरादरी के बीच झगडे आम बात है | पुन; वेसे ही राजनिति करने वाले नेता सक्रिय हो अलीगढ मुस्लिम  विश्व विद्यालय  की शाखा को मुस्लिम आत्मसम्मान से जोड़ कर गलियों में घूम रहे है |   
अब जब इस मामले में अलीगढ मुस्लिम  विश्व विद्यालय  के  कुलपति के द्वारा बिना  राष्ट्रपति के स्वीकृति के ही केंद्र खोलने के प्रयाश का पर्दा फाश हुआ तो अब कल तक बिहार सरकार को संघ के हाथो में खेलने वाला बताने वाले  यु पि ए दलों के कथित नेता आज यह बयान देते फिर रहे है की  कोई भी सरकार की गलती हो हमें तो  एएमयू चाहिए | कल तक पानी पी पी  कर संघ परिवार को कोसने वाले यु पी ए के नेता अब केंद्र की भूमिका पर कुछ भी नहीं बोल रहे  आखिर ऐसादोहरा मापदंड क्यों ?   पुरे मामले में एएमयू के कुलपती  की भूमिका की भी जांच जरूरी हो गई | क्षेत्र में एएमयू शाखा को लेकर हिन्दूओ एव मुसलमानों में जो दूरी इन दिनों पैदा हुई जिसका फायदा नेता उढा रहे है उसके लिए  एएमयू के कुलपती  ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है | एएमयू के कुलपती पि के अब्दुल अजीस द्वारा जिस हडबडी में पोधिया के शीतलपुर स्थित चाय बगान के बारे में प्रस्ताव जिला प्रशासन को दिया गया था | वह शुरुआती दोर से शक के घेरे में था | हालाकि क्षेत्र के एक अखबार प्रभात खबर ने 15 जुलाई  2011 को हे  इस  मामले के जांच के जरुरत को जरुरी बताते हुए समाचार प्रकाशित किया   था  |  हर अधिग्रहित की जाने वाली भूमी के पहले जो जांच होती है उसी तरह इसकी भी हुई मामला साफ ही नहीं हुआ लोंगो के आँखों में धुल फेखने का प्रयास विफल हुआ | इस चाय बगान का  बड़ा  भूभाग भूदान की जमीन का है | यानी भूदान के जमीन को एएमयू की आंड में देकर पूरा मुआवजा ले लिया जाय | कही इस पुरे मामले में चाय बगान मालिक ,  एएमयू कुलपति  एव  इन दिनों गली गली घूम रहे यु पी ए के नेताओ के तो मिली भगत नहीं |   शीतलपुर चाय बगान के मामले में किशनगंज जिला प्रशासन के द्वारा  स्थिती साफ़ कर देने  तथा   कुलपति के द्वारा बिना  राष्ट्रपति के स्वीकृति के ही केंद्र खोलने के प्रयास  का  बिहार सरकार द्वारा पर्दा फाश किए जाने के बाद स्थिती अब पुरी तरह साफ़ हो चुकी है | हालकी अब भी   संघ को ही पुरे मामले में घसीटा जाएगा जेसा अब तक होता आया है | कुलपति के द्वारा बिना  राष्ट्रपति के स्वीकृति के ही केंद्र खोलने के प्रयाश का पर्दा फाश हुआ |

Monday, September 5, 2011

मुंबई से चप्पल मंगाने के लिए मायावती ने भेजा खाली जहाज \विकीलीक्स खुलासे


                               विकीलीक्स के एक ताजे खुलासे के बाद  दलितों की मसीहा बनाने  की दावा करने वाली  यूपी की मुख्यमंत्री  मायावती  की कलई  खुल गई |   जिस उतर प्रदेश में एक बड़ी आबादी रात में. भूखे सोने को विवश है | वहा    खुद को दलितों की मसीहा बताने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने अपने लिए एक जोड़ी चप्पल मुंबई से मंगाने के वास्ते एक निजी जेट विमान भेजा था. भारत में अमेरिकी दूतावस द्वारा वाशिंगटन को भेजे गए कई केबल में इस  खुलासे के बाद नेताओ की अयास्सी सामने आ गई |
                                  मायावती की पीएम बनने की महत्वाकांक्षा का भी वर्णन है. मायावती को जब भी चप्पलों की जरूरत होती है तो उनकी पसंदीदा ब्रांड के चप्पल को मुंबई से लाने के लिए उनका प्राइवेट जेट खाली ही उड़ान भरता है और चप्पल लेकर लखनऊ आ जाता है. अमरीकी केबल्स के अनुसार- मायावती किसी भी राज्य पहली ऎसी सीएम हैं, जिन्होंने अपने घर से दफ्तर के लिए निजी सड़कें बनवाई. माया की रईसी का आलम यह है कि यहां से गुजरने के बाद इस सड़क की सफाई की जाती है. 23 अक्टूबर 2008 के एक केबल के मुताबिक माया ने विरोधियों द्वारा जहर दिए जाने की आशंका के मद्देनजर एक फूड टेस्टर की नियुक्ति तक कर रखी है, जो माया के खाने-पीने की चीजों की सुरक्षा करता है.
                                विकीलीक्स द्वारा जारी केबल में कहा गया है कि वे अपने जन्मदिन पर नौकरशाहों, पार्टी कार्यकर्ताओं, उद्यमियों से अरबों रुपये गिफ्ट के रूप में लेती हैं और उनके अफसर उन्हें केक खिलाने का मौका तलाशते रहते हैं. है.एक जगह बताया गया है कि मायावती ने एक नौकरशाह से इसलिए इस्तीफा ले लिया क्योंकि उनकी बेटी दिल्ली में कांग्रेस में शामिल हो गई थी. एक पत्रकार के हवाले से केबल में कहा गया है कि मायावती ने अपने एक मंत्री को दंडित करते  हुए कई घंटे तक अपने सामने जमीन पर बिठाए रखा क्योंकि उसने गलती यह की थी कि राज्यपाल से मिलने जाने से पहले इसके लिए मायावती से अनुमति नहीं ली थी. यह भी कहा गया है कि यूपी में मायावती के राज में स्थिति थोड़ी बेहतर इसलिए हो जाती है क्योंकि सारा भ्रष्टाचार मायावती सिर्फ अपने हाथ में रखती हैं, किसी और को नहीं करने देतीं.
                                 मायावती ने अपनी रसोई में कुल 9 कुक नियुक्त कर रखे हैं. इन नौ में से दो तो खाना पकाते हैं और बाकी सात लोग खाना पकाने वाले दो लोगों पर नजर रखते हैं. इस केबल में मायावती की जीवनशैली, सोच, राजनीति, भ्रष्टाचार और पार्टी चलाने तौर-तरीके आदि का खुलकर विश्लेषण किया गया है. मायावती को तमाम उपमाओं से भी नवाजा गया है. जैसे कि उन्हें “a first rate egomaniac” कहा गया है. उनके यूपी पर शासन के तरीके को “like a fiefdom” बताया गया है. .
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Sunday, September 4, 2011

फाइलों में हैं 12 शहरों के बदले हुए नाम


                 पश्चिम बंगाल का नाम पश्चिम बंग किए जाने का प्रस्ताव पिछले दिनों ममता बनर्जी सरकार द्वारा केंद्र को भेज दिया गया है। लेकिन ऐसे प्रस्ताव 1२ शहरों के लिए पहले ही भेजे जा चुके हैं। जिनकी फाइल किसी न किसी स्तर पर अटकी हुई है। इन प्रस्तावों में सबसे पुराना है पटना का। जो 1980 से लंबित है। ज्यादातर प्रस्ताव ऐसे शहरों के हैं, जिनके नाम मुगलकाल में रखे गए। मांग की जा रही है कि इन्हें बदलकर स्थानीय कर दिया जाए। हालांकि, कई मामलों में बदलाव का प्रस्ताव निर्विरोध नहीं है।
नाम के बदलाव का प्रस्ताव क्यों:
1. अहमदाबाद से कर्णावती
क्यों: 11वीं शताब्दी में राजा कर्णादेव ने कर्णावटी शहर बसाया। 15वीं शताब्दी में सुल्तान अहमद शाह ने शहर का नाम अहमदाबाद कर दिया। हुआ क्या: 11 मई 1990 को गुजरात सरकार के पास शहर का नाम बदलने का प्रस्ताव आया। इसे केंद्र सरकार को भेजा गया। केंद्र ने तो फैसला नहीं लिया, लेकिन अहमदाबाद म्युनिसिपल कापरेरेशन में कांग्रेस का बोर्ड बनते ही वह प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया।
२. भोपाल से भोजपाल
क्यों: 1010-1055 के बीच राजा भोज ने भोजपाल नाम से शहर बसाया। १७२३ में नवाब दोस्त मोहम्मद खान ने इसे भोपाल नाम दिया।
हुआ क्या: 28 फरवरी 2011 को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने शहर का नाम बदलने के लिए नगर निगम और जिला पंचायत से प्रस्ताव मांगा। जिला पंचायत से तो सहमति का प्रस्ताव मिल गया, लेकिन नगर निगम में यह दो बार खारिज हो चुका है।
३. इंदौर से इंदूर:
क्यों:
14वीं शताब्दी के इंद्रपुर को 17वीं शताब्दी में मराठा होलकर शासकों ने इंदूर नाम दिया। आजादी के बाद इसे इंदौर कर दिया गया।
हुआ क्या:
1976 में इंदौर को दोबारा इंदूर करने की मांग उठी। 1992 में इंदौर के पूर्व राजा रावनंदलाल मंडलोई के वंशज निरंजन जमींदार ने यह मामला फिर उठाया। प्रस्ताव मुख्यमंत्री की टेबल से आगे नहीं बढ़ा।
४. औरंगाबाद से संभाजीनगर: क्यों:
16वीं शताब्दी में औरंगजेब ने शहर को अपना नाम दिया। शिवाजी के पुत्र संभाजीराजे ने इस क्षेत्र में युद्ध किया।
हुआ क्या:
शिवसेना के बोर्ड वाले नगर निगम ने इसी साल शहर का नाम बदलकर संभाजीनगर करने का प्रस्ताव राज्य शासन के पास भेजा। लेकिन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने इसे बदलने से इनकार कर दिया।
५. इलाहाबाद से प्रयाग या तीर्थ राज प्रयाग
क्यों: उत्तर भारत के सबसे पुराने शहर प्रयाग का नाम मुगल शासनकाल के दौरान 15वीं शताब्दी में इलाहाबाद कर दिया गया। हुआ क्या: 2001 में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने केंद्र की एनडीए सरकार के पास शहर का नाम बदलने का प्रस्ताव भेजा। इसके विरोध में आल इंडिया मुस्लिम फोरम और पर्सनल लॉ बोर्ड ने विरोध दर्ज कराया। प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली।
६. मुगलसराय से दीनदयाल नगर
क्यों:
जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय की इसी शहर में मौत हुई थी। इसलिए भाजपा सरकार नाम बदलना चाहती थी। हुआ क्या: 1999 में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याणसिंह ने मुगलसराय का नाम दीनदयाल नगर करने की घोषणा की। इस बारे में प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया। लेकिन कुछ दिनों के बाद भाजपा सरकार गिर गई, फिर इस बारे में कोई पूछताछ नहीं हुई।
७. पटना से पाटलीपुत्र
क्यों: पांचवी शताब्दी इसा पूर्व में मगध राज्य की राजधानी का नाम पाटलीपुत्र रखा गया, जिसने चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के शासनकाल में ख्याति अर्जित की। पांच सौ वर्ष पहले इसका नाम बदलकर पटना कर दिया गया।
हुआ क्या: 1980 में बिहार सरकार ने केंद्र के पास शहर का नाम बदलने का प्रस्ताव भेजा। लेकिन उस पर कोई जवाब नहीं आया।
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ये भी हैं प्रस्ताव
८. हैदराबाद से भाग्यनगरम्
९. मैसूर से मैसूरू
1क्. मेंगलोर से मेंगलुरू
1१. आरटी नगर से राठीनगर
1२. अलीबाग से श्रीबाग --------------------------------------
बदलाव की मुख्य वजह:
-अंग्रेजी नामों की जगह स्थानीय नाम देने के लिए। (कालीकट को कोझीकोड किया गया)
-यूरोपीय मूल के नामों को भारतीय मूल का नाम बनाने के लिए। (पुर्तगाली नाम बांबे को मुंबई किया गया)
-स्थानीय भाषा के अनुसार अंग्रेजी स्पेलिंग बदली गई। (क्वीलोन को बदलकर कोल्लम किया गया)
-अरबी या फारसीमूल के नामों को भारतीय मूल का नाम देने के लिए। (अहमदाबाद का प्रस्तावित नाम कर्णावती)

अफ़जल गुरू पर खर्च हुई रकम का रिकॉर्ड नहीं


नयी दिल्लीः संसद पर हमले के दोषी और मौत की सजा पाने वाले अफ़जल गुरू की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कितनी रकम खर्च हुई, इसका ब्यौरा तिहाड़ जेल के अधिकारियों के पास नहीं है.
सूचना का अधिकार कानून के तहत मांगे गए एक प्रश्न के जवाब में जेल अधिकारियों ने यह सूचना दी है. अधिकारियों ने आवेदनकर्ता को बताया कि किसी भी कैदी के उपर खर्च होनेवाली इस तरह की राशि का ब्यौरा नहीं रखा जाता है. तिहाड़ जेल के जेल महानिदेशक कार्यालय के सार्वजनिक सूचना अधिकारी ने आवेदन के जवाब में कहा, किसी भी कैदी की सुरक्षा, सलामती और खाने-पीने के उपर खर्च होनेवाली राशि का ब्यौरा नहीं रखा गया है.
गौरतलब है कि अहमदाबाद स्थित राष्ट्रीय नागरिक अधिकार परिषद् (नेशनल काउंसिल फ़ॉर सिविल लिबर्टीज) नामक एक गैर सरकारी संगठन ने यह आवेदन दाखिल किया था और पूछा था कि सरकार ने अफ़जल गुरू की सुरक्षा और उसके खाने-पीने पर अभी तक कितना पैसा खर्च किया है. दूसरी तरफ़, एनजीओ के उपाध्यक्ष मुकेश कुमार ने इस जवाब को अविश्वसनीय बताया है और इसके खिलाफ़ जेल महानिदेशक कार्यालय की प्रथम अपीलीय प्राधिकरण के सामने अपील की है. इस अपील में कुमार ने दावा किया है कि उनकी जानकारी के मुताबिक, हर जेल में हाई-प्रोफ़ाइल कैदियों के खर्चों का ब्यौरा रखा जाता है.
अपने इस दावे की पुष्टि के लिए उन्होंने उन मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया है, जिनमें कहा गया था कि महाराष्ट्र सरकार, मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब की सुरक्षा और खाने-पीने पर होने वाले खर्चे का ब्यौरा रख रही है. अपील में एनजीओ ने कहा, हमारी जानकारी के मुताबिक इस तरह के हाई-प्रोफ़ाइल कैदी अफ़जल गुरू विशेष कक्ष में रखे जाते हैं और उसके उपर होने वाले हर तरह के खर्चे का ब्यौरा जेल अधिकारियों द्वारा रखा जाता है.

Thursday, August 18, 2011

आजादी के बाद से लेकर अब तक हुए प्रमुख घोटाले


                    आजादी के बाद से लेकर अब तक हुए प्रमुख घोटाले 

आजादी के बाद से लेकर अब तक हुए प्रमुख घोटाले-जिनमे से अधिकांश को हम भूल चुके हैं
    (1) 1948   जीप घोटाला,बी के कृष्ण मेनन | आज़ाद भारत का पहला घोटाला
    (2)1951   साइकिल घोटाला, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सचिव फंसे
    (3)1956   बीएचयू फंड घोटाला, आज़ाद भारत का पहला शैक्षणिक घोटाला
    (4)1958   मूंध्रा घोटाला, फिरोज गांधी ने किया खुलासा, फंसे वित्त मंत्री
    (5)1963   आज़ाद भारत में मुख्यमंत्री पद के दुरुपयोग का पहला मामला, आरोप प्रताप सिंह कैरों (पंजाब) पर
    (6)1965   उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक पर अपनी ही कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप
    (7)1971   नागरवाला कांड. दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट स्थित स्टेट बैंक शाखा से लाखों रुपये मांगने का            
                    मामला, इसमें इंदिरा गांधी का नाम भी उछल
    (8)1974 -  मारुति घोटाला (1974)  इंदिरा गांधी,संजय गांधी !
    (9) 1976   कुओ तेल घोटाला. आईओसी ने हांगकांग की फर्ज़ी कंपनी के साथ डील की,
    (10)1982- महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ए आर अंतुले ने ट्रस्टो के नाम पर अवेध उगाही की| मुख्यमंत्री पद  
          से ए आर अंतुले को हटना   पडा |
    (11)1986 में बोफोर्स  घोटाला| स्वीडन की ए बी बोफोर्स कंपनी से 155 तोपें खरीदने का सौदा में 64 
          करोड़ रुपये की दलाली दी गई थी | क्वात्रोची और राजीव गांधी का नाम इसमें सामने आया. 
    (12)1989  सेंट किट्‌स धोखाधड़ी.   वी पी सिंह पर अवैध पैसा लेने का आरोप लगवाया गया .  
    (13) 1990 बिहार का चारा घोटाला. लालू प्रसाद यादव जब मुख्यमंत्री थे तो  950 करोड़ रुपए का यह 
          घोटाला सामने आया.   .
    (14) 1990 - अनंतनाग ट्रांसपोर्ट सब्सिडी स्कैम, चुरहट लाटरी स्कैम, एयरबस स्कैंडल 
    (15) 1992 - शेयर बाजार घोटाला- 4000 करोड़ रुपए के इस घोटाले में दलाल हर्षद मेहता ने इस मामले 
          में नरसिम्हाराव पर भी आरोप लगाया था, लेकिन अंत तक असली अपराधियों का नाम सामने नहीं 
          आ सका. हर्षद मेहता की मृत्यु जेल में रहने के दौरान ही हो गई
    (16)1995 प्रीफेंशियल अलॉटमेंट घोटाला 5000 करोड़
    (17)1992 - इन्डियन  बैंक घोटाला  
    (18)1992 -  सिक्योरिटी स्कैम  
    (19) लक्खू भाई पाठक केस. अचार व्यापारी लक्खू भाई पाठक ने नरसिम्हाराव और चंद्रा स्वामी पर 10 लाख रुपये रिश्वत लेने  का आरोप लगाया. लक्खू भाई पाठक इंग्लैंड में रहने वाले भारतीय व्यापारी थे
    (20) 1996 दूरसंचार घोटाला -  सरकार को 1.6 करोड़ रुपये का घाटा हुआ.
    (21)1996 यूरिया घोटाला -  दो लाख टन यूरिया आयात करने के मामले में सरकार को 133 करोड़ रुपये का चूना लगा दिया. यह यूरिया कभी भारत तक पहुंच ही नहीं पाई.
    (22) हवाला घोटाला - 1991 में सीबीआई  छापे में एस के जैन की डायरी बरामद हुई. इस घोटाले में 18 मिलियन डॉलर घूस के रूप में देने का मामला सामने आया, जो कि बड़े-बड़े राजनेताओं को दी गई थी. आरोपियों में से एक लालकृष्ण आडवाणी भी थे, जो उस समय नेता विपक्ष थे.
    (23)1993 - सांसद घुस काण्ड  नरसिम्हाराव के समय झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसद  को 30-30 लाख रुपये दिए गए, ताकि  नरसिम्हाराव की सरकार को समर्थन देकर बचाया जा सके. यह घटना 1993 की है. इस मामले में शिबू सोरेन को जेल भी जाना पड़ा. 
    (24)चीनी घोटाला - 1994 में खाद्य आपूर्ति मंत्री कल्पनाथ राय ने बा़जार भाव से भी महंगी दर पर चीनी आयात का फैसला लिया. यानी चीनी घोटाला. इस कारण सरकार को 650 करोड़ रुपये का चूना लगा. अंतत: उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. उन्हें इस मामले में जेल भी जाना पड़ा
    (25)1995 जूता घोटाला. सोहिन दया नामक एक व्यापारी ने मेट्रो शूज के रफीक तेजानी और मिलानो शूज के किशोर सिगनापुरकर के साथ मिलकर कई सारी फर्जी चमड़ा कोऑपरेटिव सोसाइटियां बनाईं और सरकारी धन लूटा.
    (26)1995 मेघालय फॉरेस्ट घोटाला 300 करोड़
    (27)1995 कॉबलर घोटाला 1000 करोड़
    (28)1995 यूगोस्लेव दिनार घोटाला (हवाला) 400 करोड़
    (29)1995 वीरेंद्र रस्तोगी (कस्टम व कर घोटाला) 43 करोड़
    (30)1997 बिहार भूमि घोटाला 400 करोड़
    (31)1997 एसएनसी पॉवर प्रोजेक्ट घोटाला 374 करोड
     (32)तहलका के स्टिंग ऑपरेशन ने यह खुलासा किया कि कैसे कुछ वरिष्ठ नेता रक्षा समझौते में गड़बड़ी करते हैं.भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को रिश्वत लेते हुए लोगों ने टेलीविजन और अ़खबारों में देखा. इस घोटाले में तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज और भारतीय नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार का नाम भी सामने आया. इस मामले में अटल बिहारी वाजपेयी ने जॉर्ज फर्नांडीज का इस्ती़फा मंजूर करने से इंकार कर दिया. हालांकि बाद में जॉर्ज ने इस्ती़फा दे दिया. 
    (33)2000 - मैच फिक्सिंग के लिए  याद कीजिए. जेंटलमैन स्पोट्‌र्स यानी क्रिकेट में मैच फिक्सिंग का धब्बा पहली बार भारतीय खिलाड़ियों पर लगा. इसमें प्रमुख रूप से अज़हरुद्दीन और अजय जडेजा का नाम सामने आया. अजय शर्मा और अजहर पर आजीवन प्रतिबंध लगा तो जडेजा और मनोज प्रभाकर पर पांच साल का प्रतिबंध
    (34)1998 उदय गोयल(कृषि उपज निवेश) घोटाला 210 करोड़
    (35)1998 टीक प्लांटेशन घोटाला 8000 करोड़(25)1999 - ताबूत घोटाला 
     (36)2001 केतन पारिख (प्रतिभूति घोटाला) 1000 करोड़2001 दिनेश डालमिया शेयर घोटाला 595 करोड़
    (37)2002 संजय अग्रवाल(गृह निवेश) घोटाला 600 करोड़
    (38)2002 कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज घोटाला 120 करोड़
    (39)बराक मिसाइल रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार का एक और नमूना बराक मिसाइल की खरीदारी में देखने को मिला. इसे इज़रायल से खरीदा जाना था, जिसकी क़ीमत लगभग 270 मिलियन डॉलर थी. इस सौदे पर डीआरडीपी के तत्कालीन अध्यक्ष ए पी जे अब्दुल कलाम ने भी आपत्ति दर्ज कराई थी. फिर भी यह सौदा हुआ. इस मामले में एफआईआर भी दर्ज हुई. एफआईआर में समता पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष आर के जैन की गिरफ्तारी भी हुई. जॉर्ज फर्नांडीस, जया जेटली और नौसेना के एक पूर्व अधिकारी सुरेश नंदा के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज हुई. 

    (40)2001 यूटीआई घोटाला. 48 हजार करोड़ रुपये का यह घोटाला पूर्व यूटीआई चेयरमैन पी एस सुब्रमण्यम और दो निदेशकों एम एम कपूर और एस के बासु ने मिलकर किया. ये सभी गिरफ्तार हुए, लेकिन सज़ा किसी को नहीं मिली.
    (41)2003  20000 करोड़ स्टांप पेपर घोटाला जब सामने आया था, तब इसे सबसे बड़े घोटाले का ताज मिला था. इसके पीछे अब्दुल करीम तेलगी को मास्टर माइंड बताया गया. इस मामले में उच्च पुलिस अधिकारी से लेकर राजनेता तक शामिल थे. तेलगी की गिरफ्तारी तो ज़रूर हुई, लेकिन इस घोटाले के कुछ और अहम खिलाड़ी साफ बच निकलने में अब तक कामयाब हैं.
    (42)2005 बिहार बाढ़ आपदा राहत घोटाला 17 करोड़
    (43)2005 स्कॉर्पियन पनडुब्बी घोटाला 18,978 करोड़
    (44)तेल के बदले अनाज. वोल्कर रिपोर्ट के आधार पर यह बात सामने आई कि तत्कालीन विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपने बेटे को तेल का ठेका दिलाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया. उन्हें इस्ती़फा देना पड़ा, हालांकि सरकार ने उन्हें बिना विभाग का मंत्री बनाए रखा. 
    (45)2006 पंजाब सिटी सेंटर प्रोजेक्ट घोटाला 1500 करोड़
    (46)सत्यम घोटाला. कार्पोरेट जगत का शायद सबसे बड़ा घोटाला. 14 हज़ार करोड़ रुपये के इस घोटाले में सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज के मालिक राम लिंग राजू का नाम आया. राजू ने इस्ती़फा दिया और वह अभी भी जेल में हैं. मुकदमा चल रहा है
    (47)2008 हसन अली (टैक्स व हवाला ) 39,120 करोड़
    (48)2008 स्विस बैंक में मौजूद काला धन 210000 करोड़
    (49)2008 स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र घोटाला 95 करोड़
    (50)2008 सैन्य राशन घोटाला 5000 करो
    (51)2009 झारखंड खदान घोटाला 4000 करोड़ - झारखंड के मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने. 4 हज़ार करोड़ से भी ज्यादा की काली कमाई की कोड़ा ने. बाद में इन पैसों को विदेश भेजकर जमा किया और विदेशों में निवेश किया. इस मामले में केस दर्ज हुआ. कोड़ा फिलहाल जेल में हैं. जांच चल रही है.
     (52)2009 चावल निर्यात घोटाला 2500 करोड़
    (53)2009 उड़ीसा खदान घोटाला 7000 करोड़
    (54)2009 झारखंड मेडिकल उपकरण घोटाला 130 करोड़
    (55)कैश फॉर वोट स्कैंडल (2003)
    (56) 2010 - राष्ट्रमंडल खेल घोटाला. हजारों करोड़ रुपये का घोटाला, जिसमें अधिकारी से लेकर नेता तक शामिल थे. सीवीसी ने अपनी जांच में कहा कि अनियमितताएं हुईं. फिलहाल सुरेश कलमाडी को राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है. सीबीआई जांच कर रही है. कुछ अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया 
    (57)2010  आदर्श घोटाला. आदर्श कोऑपरेटिव सोसाइटी (लि.) ने ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से कोलाबा के आवासीय क्षेत्र नेवी नगर और रक्षा प्रतिष्ठान के आसपास इमारत का निर्माण किया. यह योजना कारगिल युद्ध में शहीद हुए लोगों के परिवार वालों के लिए बनाई गई थी, जबकि इसके फ्लैट्‌स 80 फीसदी असैनिक नागरिकों को आवंटित किए गए. इस कारनामे में सेना के शीर्ष अधिकारी तक शामिल थे. सेना के दोषी अधिकारियों के खिला़फ कार्रवाई होनी बाकी है. मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण से इस्ती़फा ले लिया गया.

    (58) 2003 - ताज कॉरिडोर. 175 करोड़ रुपये के इस घोटाले में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती पर लगातार तलवार लटकी रही और अब भी लटकी हुई है. 

    (59)2011 - २ जी स्पेक्ट्रम घोटाला -  2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला करीब 1.77 लाख करोड़ रुपये का है।2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन के लिए बोली लगाने के दौरान अनियमितताओं के आरोपों के बाद   दूरसंचार मंत्री ए राजा की विदाई एवं गिरफ्तारी , उच्च स्तरीय नाटक में  बड़ो पर धांधली का आरोप | 

    (60) 2011 - रेलवे के तत्‍काल रिजर्वेशन में घोटाला

    (61) 2011 -  कोयला घोटाला करीब चालीस लाख करोड़ का है। यानी टूजी घोटाले से पच्चीस गुना   

                           बड़ा घोटाला।  


    (62)आईपीएल घोटाला - आईपीएल में 1200 से 1500 करोड़ रुपए का घोटाला होने की बात कही जा रही है।
       

    Saturday, December 18, 2010

    मेहमान पंक्षियों से गुलजार हुआ कच्चूदह झील

    ठाकुरगंज के छैतल पंचायत अंतर्गत दो सौ एकड़ में फैले कच्चूदह झील के सिकुड़ते आकार के बावजूद प्रत्येक वर्ष विदेशी पक्षियों का यहां बड़े पैमाने पर आना होता है। ठंडक के मौसम में यह झील मेहमान पंक्षियों के कौतूहल से गुलजार हो जाता है। इस बार भी बड़े पैमाने पर सैलानी पंक्षी आये हैं। झील पर शिकारियों की कुदृष्टि भी रहती है। इसके चलते सैकड़ों पंक्षी अपने साथी खोकर लौटते हैं। शिकारियों पर अंकुश के लिए संबंधित विभाग द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जाती है।
    इस संबंध में पर्यावरण विद्  मानते है  कि ठाकुरगंज तथा पोठिया क्षेत्र में कई प्रजातियों के विदेशों पंक्षी नवम्बर के अंतिम सप्ताह से आना शुरू कर देते हैं और वह मार्च तथा अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक यहां रहते हैं। इस दौरान किसी भी प्रजाति की पंक्षी यहां प्रजनन नहीं करता। अनुकूल वातावरण में पक्षी यहां रहकर वापस साईवेरिया चले जाते हैं।   इस समय लालसर पंक्षी काफी कम संख्या में आते है। कारण यह है कि लालसर और चाहा को स्थानीय लोग मारकर खा जाते हैं। इसी प्रकार मेहमान पंक्षियों में नीलसर, खजंन, गढ़वाल, गारगेनी, वाडहेडगिज आदि का भी लोग शिकार करते हैं।
    अबा तक जनप्रतिनिधियों द्वारा झील को पर्यटन स्थल में तब्दील कराने का वायदा किया जाता रहा है, लेकिन उसे अब तक हकीकत में नहीं बदला जा सका है।  झील के उअपेक्षा  के  कारन लगभग दो सौ एकड़ में फैले झील में पानी काफी कम हो गया है।  यह झील जिला ही नहीं प्रदेश की धरोहर है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं करना क्षेत्र के लोगों के साथ अन्याय है।
    कई बार अधिकारी भी इस झील का निरीक्षण किये। नौका बिहार व पर्यटन स्थल बनाने की बात हुई, लेकिन बस योजना बनाने की बात तक ही मामला सीमट कर रह गया।

    Thursday, December 16, 2010

    एमएलए फ़ंड बंद कर बिहार ने दिखाया देश को राह |



                            वह बिहार, जो कल तक पूरे देश में व्यंग्य, हास्य और कटु बातों का पर्याय था, वही आज पुरे देश के सामने एक नई नजीर पेश कर रहा है |  विधायक मद ख़त्म कर बिहार ने भ्रस्टाचार के जड़ पर वार कर दिया है  | अगर यह हो गयातो एक नयी शुरुआत के संकेत बिहार ने दे दी है   सता संभाने के बाद बिहार के फिजाओं में फेली कुछ बातो ने सारे देश के लिए एक नई बहस झेड दे है | (1)   एमएलए फ़ंड बंद किया जाए (2) भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जंग.(3) लोक सेवा पाने का हक.(4) सासंद-विधायक देंगे संपत्ति का ब्योरा. | बता दू  एमपी या एमएलए फ़ंड, भारतीय राजनीति की एक गंभीर बीमारी (भ्रष्टाचार का कैंसर) का सबसे दागदार प्रतीक है.  जनता की लोक मान्यता है कि खांटी ईमानदार भी घर बैठे-बैठे 20 फ़ीसदी, इस कोष से पाते हैं. | आज यह मान लिया गया है कि एमपी-एमएलए फ़ंड, भ्रष्टाचार की संस्कृति का स्र्ोत है. याद करिए, इसकी शुरुआत? पूत के पांव पालने में ही पहचाने जाते हैं? नरसिंह राव की सरकार को लोकसभा में बहुमत सिद्ध करना था. 1991-1996 का दौर. पहली बार तब सांसद घूस कांड हुआ. सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फ़रोख्त की पहली घटना, भारतीय लोकतंत्र में.उसी सरकार के मौलिक चिंतन या सांसदों को खुश रखने की योजना से ही इसकी शुरूआत.| इस सांसद-विधायक फ़ंड ने, राजनीति के सतीत्व (ईमानदारी) पर सवाल उठा दिया है? इसने पवित्र और धवल राजनीति के चादर पर सबसे गहरा दाग छोड़ा है. इसे नकारते सभी हैं. कुछ ही दिनों पहले लालू जी ने भी कहा था कि एमएलए फ़ंड से अब कार्यकर्ता नहीं, ठेकेदार उपजते हैं. पिछले 15 वर्षो में केंद्र से लेकर अनेक राज्यों के ईमानदार राजनेता (सभी दलों के) इसे कोसते रहे हैं. पर कोई साहस नहीं कर सका, इसे हटाने या इसके स्वरूप को बदलने के लिए? बिहार की राजनीति में इसे हटाने यह इसके स्वरूप को बदलने की सुगबुगाहट है, यह उम्मीद पैदा करनेवाला कदम होगा. इस अर्थ में बिहार की राजनीति, देश को राह दिखायेगी. जो राजनीति व्यवसाय-धंधा का प्रतीक बन गयी है, उसकी साख लौटाने के यह तो एक शुरुआत है | इस फंड ने दलों में कार्यकर्ताओं का पनपना-जनमना बंद हो गया था |. ठेकेदार बननेवालों की स्पर्धा शुरू हो गयी. बिचौलिये या ठेकेदार, नयी राजनीतिक संस्कृति के जन्मदाता हो गये. ठेकेदार नाराज, तो ईमानदार राजनेता के भविष्य पर प्रश्न चि: लगने लगा? यह योजना लांछन की प्रतीक बन गयी. इस लांछन से मुक्ति की पहल, बिहार से हो, यह एक सुखद एहसास है |                          बिहार ने इसे खत्म करने की पहल कर पूरे देश की राजनीति में यह बहस छेड़ दी है  | इस  प्रो-पीपुल कदम ने देश के सभी दलों को, पूरी राजनीति के मौजूदा व्याकरण को बदलने की पृष्ठभूमि तैयार कर दी |. यह कदम उठानेवाले बिहार के सभी विधायक, बिहार समेत अपने लिए यश और कीर्ति का नया अध्याय लिखेंगे. राजनीति के इतिहास में बिहार स्मरण किया जायेगा.भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मोरचा खोलने का सरकारी निर्णय भी दूरगामी असर पैदा करनेवाला है. 
                          जब-जब भ्रष्टाचार का मामला उठा है, जनता एक हुई है.74 आंदोलन, 77 के चुनाव. 1998 में बोफ़ोर्स का प्रकरण. 2जी, कामनवेल्थ घोटाला, आदर्श सोसाइटी प्रकरण वगैरह से देश की राजनीति से बदबू आने लगी है.राडिया प्रकण के खुलासे से रही-सही बातें पूरी हो गयी हैं. इस टेप में कहीं चर्चा है कि एक राष्ट्रीय शासक दल को एक बड़ा घराना, घरेलू (घर की बात) कहता है.बिहार में भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए कानून बना है. देश के इस परिवेश-माहौल में इस कानून का ईमानदार क्रियान्वयन एक नया माहौल बनायेगा. बिहार में ही नहीं, देश में  भ्रष्टाचार, छल, कपट और षड्यंत्र की राजनीति का बोलबाला है. दिल्ली पूरी तरह इसके गिरफ्त में है.शासन या सत्ता, चाहे जिसका हो. इस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बिहार की यह पहल, दुनिया की निगाह खींचेगी.
                        
    भारतीय राजनीति में सुधार अब दिल्ली से संभव नहीं. अगर एक राज्य में सुधार हुए, तो उसके देशव्यापी असर होंगे. बिहार यह प्रयोगस्थली बन सकता है.  कहावत हैसीइंग इज बिलिविंग  (देखना ही प्रमाण है). अर्थशास्त्र में एक लफ्ज है, डिमांस्ट्रेटिव इंपैक्ट (नमूने या प्रयोग का असर). फ़र्ज कीजिए कि बिहार के कानून के तहत भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जब्त होती है, फ़ास्टट्रैक कोर्ट में ट्रायल होता है, यह सब पूरा देश देखेगा, तो क्या होगा? इसका प्रभाव व दबाव अनंत-असीमित होगा. समाजशास्त्र की नजर में समाज खेमे में बंटेगा,हैव व हैव नाट, फ़िर, भ्रष्ट, बेईमान बनाम ईमानदार के बीच. साम्यवाद की भाषा में बुर्जुआ बनाम सर्वहारा के बीच. भारतीय राजनीति में जिस तरह गरीबी हटाओ, मंडल, कमंडल ने ध्रुवीकरण पैदा किया था, उससे भी तीखा, प्रभावी और धारदार मुद्दा है, यह. बिहार के लिए ही नहीं. देश के लिए. शत्र्त यही है कि इसका ईमानदार क्रियान्वयन हो.                    भारतीय राजनीति में संभावनाओं के नये द्वार खोलनेवाला, यह कानून. हाल मेंद हिंदूके एक लेख में यह बात उभरी कि91 के उदारीकरण के बाद भारत में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ा है. ज्वार-भाटा की तरह. बिहार की राजनीति अश्वमेध के घोड़े की भूमिका में सक्रिय भ्रष्टाचार की बाग थाम ले या इस कालिया नाग को नाथने की शुरूआत कर दे, तो देखिए देश की राजनीति में क्या बदलाव होते हैं? फ़र्ज करिए कि यहां के विधायक, मंत्री, सांसद, अफ़सर हर वर्ष संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करते हैं, तो इसका क्या असर होगा? कानून तो अब भी है. आयकर का कानून है. चुनाव आयोग का कानून. पर सही क्रियान्वयन कहां है? सही अर्थ में बिहार से अगर नयी शुरूआत होती है, तो देश की राजनीति में इसका असर होगा. यह सूचना का युग है. ज्ञान का दौर है. यहां लोकसेवा कानून हो जाये, इन चीजों की सही और ईमानदार शुरूआत हो जाये, तो फ़िर दृश्य दिखेंगे.भारतीय मानस, ईमानदार राजनीति की प्रतीक्षा में है. बाहर और अंदर के खतरों से घिरा है, देश और रहनुमा हैं काजल की कोठरी में? यह स्थिति मुल्क की है. मुल्क नयी राजनीति, नये राजनीतिक मूल्यों और संस्कृति की तलाश में है.बिहार के प्रयोग संभावनाओं से भरे हैं.चाहिए सिर्फ़ सही क्रियान्वयन.